श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  13.44.21 
आवयोरनृतं प्राह यस्तस्याभूद् द्विजस्य वै।
विपुलस्य परे लोके या गति: सा भवेदिति॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हममें से जो भी झूठ बोलेगा, उसका वही हश्र होगा जो अगले लोक में ब्राह्मण विपुल का हुआ।'
 
Whoever amongst us tells a lie will meet the same fate as is destined for the Brahmin Vipul in the next world.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)