vedamrit
Reset
Home
प्रमुख ग्रंथ
भगवद गीता
श्रीमद् रामायण
श्रीमद् भागवतम
श्री महाभारत
श्री रामचरितमानस
श्रीमद् विष्णु पुराण
श्रीचैतन्य भागवत
श्रीचैतन्य चरितामृत
भक्तिरसामृतसिन्धु
वैष्णव भजन, इस्कॉन आरती
Apps
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 13: अनुशासन पर्व
»
अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना
»
श्लोक 21
श्लोक
13.44.21
आवयोरनृतं प्राह यस्तस्याभूद् द्विजस्य वै।
विपुलस्य परे लोके या गति: सा भवेदिति॥ २१॥
अनुवाद
हममें से जो भी झूठ बोलेगा, उसका वही हश्र होगा जो अगले लोक में ब्राह्मण विपुल का हुआ।'
Whoever amongst us tells a lie will meet the same fate as is destined for the Brahmin Vipul in the next world.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
About Us
|
Contact Us
|
Privacy Policy
|
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2023 vedamrit.in - All Rights Reserved. Developed by ACd
Download SongBook App
Install
×