Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.44.2: पृथ्वीनाथ! उस तप से विपुल के हृदय में अभिमान उत्पन्न हुआ और वह दूसरों से प्रतिस्पर्धा करने लगा। नरेश्वर! उन्हें अपने गुरु से यश और आशीर्वाद दोनों प्राप्त हो चुके थे; अतः वे निर्भय और संतुष्ट होकर पृथ्वी पर विचरण करने लगे॥2॥ | mahabharat अध्याय 13.44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
पृथ्वीनाथ! उस तप से विपुल के हृदय में अभिमान उत्पन्न हुआ और वह दूसरों से प्रतिस्पर्धा करने लगा। नरेश्वर! उन्हें अपने गुरु से यश और आशीर्वाद दोनों प्राप्त हो चुके थे; अतः वे निर्भय और संतुष्ट होकर पृथ्वी पर विचरण करने लगे॥2॥
Prithvinath! Vipul felt proud in his heart through that penance and started competing with others. Nareshwar! He had received both fame and blessings from his Guru; Hence, they started wandering on earth fearless and satisfied. 2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥