श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  13.44.19 
त्वं शीघ्रं गच्छसीत्येकोऽब्रवीन्नेति तथा पर:।
नेति नेति च तौ राजन् परस्परमथोचतु:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! उनमें से एक ने कहा, ‘आप तो बहुत तेज चलते हैं।’ दूसरे ने कहा, ‘नहीं।’ इस प्रकार वे दोनों एक-दूसरे को दोष देते हुए एक-दूसरे से ‘नहीं, नहीं’ कहते रहे॥19॥
 
O Lord of men! One of them said, 'You walk so quickly.' The other said, 'No.' In this way both of them were blaming each other and saying 'no, no' to each other.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)