श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  13.44.18 
तत्रैकस्तूर्णमगमत् तत्पदे च विवर्तयन्।
एकस्तु न तदा राजंश्चक्रतु: कलहं तत:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
महाराज! उनमें से एक ने अपनी गति बढ़ा दी और दूसरे ने नहीं बढ़ाई। इस पर दोनों आपस में लड़ने लगे।
 
King! One of them increased his speed and the other did not do so. On this both of them started fighting with each other. 18.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)