श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.44.17 
स वने निर्जने तात ददर्श मिथुनं नृणाम्।
चक्रवत् परिवर्तन्तं गृहीत्वा पाणिना करम्॥ १७॥
 
 
अनुवाद
एक निर्जन जंगल में पहुंचने पर उन्होंने एक जोड़े को एक-दूसरे का हाथ थामे कुम्हार के चाक की तरह घूमते देखा।
 
On reaching a deserted forest, he saw a couple holding hands and rotating like a potter's wheel.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)