श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 44: विपुलका गुरुकी आज्ञासे दिव्य पुष्प लाकर उन्हें देना और अपने द्वारा किये गये दुष्कर्मका स्मरण करना  »  श्लोक 13-14
 
 
श्लोक  13.44.13-14 
विपुलस्तु गुरोर्वाक्यमविचार्य महातपा:।
स तथेत्यब्रवीद् राजंस्तं च देशं जगाम ह॥ १३॥
यस्मिन् देशे तु तान्यासन् पतितानि नभस्तलात् ।
अम्लानान्यपि तत्रासन् कुसुमान्यपराण्यपि॥ १४॥
 
 
अनुवाद
राजन! गुरु की आज्ञा पाकर महातपस्वी विपुल ने बिना कुछ विचार किए 'बहुत अच्छा' कहकर उस स्थान की ओर प्रस्थान किया जहाँ वे पुष्प आकाश से गिरे थे। वहाँ और भी बहुत से पुष्प पड़े थे, जो मुरझाए नहीं थे॥13-14॥
 
King! On receiving the orders of his Guru, the great ascetic Vipul, without giving it any further thought, said 'very good' and proceeded towards the place where those flowers had fallen from the sky. There were many more flowers lying there, which had not wilted.॥ 13-14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)