श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.43.30 
अभिवाद्य च शान्तात्मा स गुरुं गुरुवत्सल:।
विपुल: पर्युपातिष्ठद् यथापूर्वमशङ्कित:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
शान्त एवं गुरु-प्रेमी विपुल ने अपने गुरुदेव को प्रणाम किया और पहले की भाँति निर्भयतापूर्वक उनकी सेवा में उपस्थित हो गया।
 
The calm and guru-loving Vipul bowed to his Gurudev and fearlessly presented himself to his service as before.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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