Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.43.26: यदि तू अपने को अमर मानकर मनमानी कर रहा है, तो (मैं तुझे चेतावनी देता हूँ) किसी तपस्वी का इस प्रकार अपमान मत कर; क्योंकि तप से कोई भी बात असम्भव नहीं है (तपस्वी तो अमर को भी मार सकता है)।॥26॥ | mahabharat अध्याय 13.43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अमरोऽस्मीति यद्बुद्धिं समास्थाय प्रवर्तसे।
मावमंस्था न तपसा नसाध्यं नाम किंचन॥ २६॥
अनुवाद
यदि तू अपने को अमर मानकर मनमानी कर रहा है, तो (मैं तुझे चेतावनी देता हूँ) किसी तपस्वी का इस प्रकार अपमान मत कर; क्योंकि तप से कोई भी बात असम्भव नहीं है (तपस्वी तो अमर को भी मार सकता है)।॥26॥
If you are indulging in arbitrariness by believing that you are immortal, then (I warn you) do not insult any ascetic in this manner; because nothing is impossible through penance (an ascetic can even kill immortals).॥26॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥