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mahabharat 13.43.15: जब उस चन्द्रमा के समान मुख से संस्कृत के ये शब्द निकले, तब रुचि वशीभूत हो गई और उन शब्दों को कहने में उसे बड़ी लज्जा आई ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 13.43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 43: विपुलका देवराज इन्द्रसे गुरुपत्नीको बचाना और गुरुसे वरदान प्राप्त करना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.43.15 
वक्त्राच्छशाङ्कसदृशाद् वाणी संस्कारभूषणा।
व्रीडिता सा तु तद्वाक्यमुक्त्वा परवशा तदा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जब उस चन्द्रमा के समान मुख से संस्कृत के ये शब्द निकले, तब रुचि वशीभूत हो गई और उन शब्दों को कहने में उसे बड़ी लज्जा आई ॥15॥
 
When these words of Sanskrit came out of that moon-like mouth, Ruchi became subservient and felt very ashamed for having uttered those words. ॥15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)