श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  13.42.58 
लक्षणं लक्षणेनैव वदनं वदनेन च।
अविचेष्टन्नतिष्ठद् वै छायेवान्तर्हितो मुनि:॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
वे एक चिह्न से दूसरे चिह्न में और एक मुख से दूसरे मुख में प्रवेश करते हुए बिना किसी प्रकार की हलचल किए स्थिर अवस्था में स्थित रहे। उस समय अदृश्य हुए वे महामुनि छाया के समान प्रकट हुए॥58॥
 
‘He entered from signs to signs and mouth to mouth and remained in a steady state without making any movement. At that time the great sage who had disappeared appeared like a shadow.'॥ 58॥
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