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mahabharat 13.42.52-53: मैं रजोगुण से मुक्त हूँ, अतः मुझसे कोई अपराध नहीं हो सकता। जैसे कभी-कभी यात्री निर्जन धर्मशाला में रुक जाता है, वैसे ही आज मैं सावधान होकर अपने गुरु की पत्नी के शरीर में निवास करूँगा। उसी प्रकार मैं उनके शरीर में निवास कर सकूँगा।॥ 52-53॥   |   mahabharat अध्याय 13.42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना  »  श्लोक 52-53
 
 
श्लोक  13.42.52-53 
निर्मुक्तस्य रजोरूपान्नापराधो भवेन्मम।
यथा हि शून्यां पथिक: सभामध्यावसेत् पथि॥ ५२॥
तथाद्यावासयिष्यामि गुरुपत्न्या: कलेवरम्।
एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहित:॥ ५३॥
 
 
अनुवाद
मैं रजोगुण से मुक्त हूँ, अतः मुझसे कोई अपराध नहीं हो सकता। जैसे कभी-कभी यात्री निर्जन धर्मशाला में रुक जाता है, वैसे ही आज मैं सावधान होकर अपने गुरु की पत्नी के शरीर में निवास करूँगा। उसी प्रकार मैं उनके शरीर में निवास कर सकूँगा।॥ 52-53॥
 
‘I am free from Rajoguna; hence I cannot commit any crime. Just as a traveller sometimes stops at a deserted Dharamshala, similarly today I will be cautious and reside in the body of my Guru's wife. In the same way I will be able to reside in her body.'॥ 52-53॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)