Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 13.42.50-51: अतः मुझे योगबल से अपने गुरुपत्नी के शरीर में प्रवेश करना चाहिए। जैसे कमलपत्र पर पड़ी हुई जल की बूँद उस पर अनासक्त भाव से स्थिर रहती है, वैसे ही मैं भी अपने गुरुपत्नी के भीतर अनासक्त भाव से निवास करूँगा। 50-51॥   |   mahabharat अध्याय 13.42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना  »  श्लोक 50-51
 
 
श्लोक  13.42.50-51 
योगेनाथ प्रवेशो हि गुरुपत्न्या: कलेवरे॥ ५०॥
एवमेव शरीरेऽस्या निवत्स्यामि समाहित:।
असक्त: पद्मपत्रस्थो जलबिन्दुर्यथाचल:॥ ५१॥
 
 
अनुवाद
अतः मुझे योगबल से अपने गुरुपत्नी के शरीर में प्रवेश करना चाहिए। जैसे कमलपत्र पर पड़ी हुई जल की बूँद उस पर अनासक्त भाव से स्थिर रहती है, वैसे ही मैं भी अपने गुरुपत्नी के भीतर अनासक्त भाव से निवास करूँगा। 50-51॥
 
Therefore, I should enter the body of my Guru's wife with the power of yoga. Just as a drop of water lying on a lotus leaf remains stable on it with an unattached feeling, in the same way I will also reside inside my Guru's wife with an unattached feeling. 50-51॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)