श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  13.42.34 
सिंहव्याघ्रगजानां च रूपं धारयते पुन:।
दैवं दैत्यमथो राज्ञां वपुर्धारयतेऽपि च॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
वह प्रायः सिंह, व्याघ्र और हाथी का रूप धारण करता है। वह देवताओं, राक्षसों और राजाओं का शरीर भी धारण करता है ॥34॥
 
He frequently assumes the form of a lion, tiger and elephant. He also assumes the bodies of gods, demons and kings. ॥ 34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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