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श्लोक 13.42.27  |
भीष्म उवाच
तत: स भगवांस्तस्मै विपुलाय महात्मने।
आचचक्षे यथातत्त्वं मायां शक्रस्य भारत॥ २७॥ |
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| अनुवाद |
| भीष्मजी कहते हैं - भरतनन्दन ! तत्पश्चात् भगवान् देवशर्मा महात्मा विपुल को इन्द्र की माया का यथार्थ वर्णन करने लगे ॥27॥ |
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| Bhishmaji says – Bharatnandan! Thereafter, Lord Devasharma started narrating the reality of Indra's illusion to Mahatma Vipul. 27॥ |
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