Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.42.24-25: भीष्म कहते हैं - राजन! अपने गुरु की यह बात सुनकर सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले, सदैव कठोर तपस्या में तत्पर रहने वाले, धर्म के ज्ञाता और सत्यवादी विपुल ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। महाराज! जब गुरु जाने लगे, तब उसने पुनः इस प्रकार पूछा। 24-25। | mahabharat अध्याय 13.42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
भीष्म उवाच
इत्युक्तो विपुलस्तेन तपस्वी नियतेन्द्रिय:॥ २४॥
सदैवोग्रतपा राजन्नग्न्यर्कसदृशद्युति:।
धर्मज्ञ: सत्यवादी च तथेति प्रत्यभाषत।
पुनश्चेदं महाराज पप्रच्छ प्रस्थितं गुरुम्॥ २५॥
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - राजन! अपने गुरु की यह बात सुनकर सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी, अपनी इन्द्रियों को वश में रखने वाले, सदैव कठोर तपस्या में तत्पर रहने वाले, धर्म के ज्ञाता और सत्यवादी विपुल ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली। महाराज! जब गुरु जाने लगे, तब उसने पुनः इस प्रकार पूछा। 24-25।
Bhishma says - King! On hearing this from his Guru, Vipul, who was as radiant as the Sun and Fire, who had controlled his senses, who was always engaged in rigorous penance, who was a knower of Dharma and a truthful person, accepted his orders saying 'very good'. Maharaj! Then when the Guru started to leave, he again asked in this manner. 24-25.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥