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mahabharat 13.42.20-21h: पिताश्री! एक बार एक ऋषि ने यज्ञ करने का विचार किया। उस समय वे सोचने लगे, 'यदि मैं यज्ञ में सम्मिलित हो जाऊँगा, तो मेरी पत्नी की रक्षा कैसे होगी?'॥20 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 13.42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 42: भृगुवंशी विपुलके द्वारा योगबलसे गुरुपत्नीके शरीरमें प्रवेश करके उसकी रक्षा करना  »  श्लोक 20-21h
 
 
श्लोक  13.42.20-21h 
स कदाचिदृषिस्तात यज्ञं कर्तुमनास्तदा॥ २०॥
भार्यासंरक्षणं कार्यं कथं स्यादित्यचिन्तयत्।
 
 
अनुवाद
पिताश्री! एक बार एक ऋषि ने यज्ञ करने का विचार किया। उस समय वे सोचने लगे, 'यदि मैं यज्ञ में सम्मिलित हो जाऊँगा, तो मेरी पत्नी की रक्षा कैसे होगी?'॥20 1/2॥
 
Father! Once a sage thought of performing a yajna. At that time he started thinking, 'If I get involved in the yajna, how will my wife be protected?'॥ 20 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)