श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 40: पञ्चचूड़ा अप्सराका नारदजीसे स्त्रियोंके दोषोंका वर्णन करना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.40.30 
यतश्च भूतानि महान्ति पञ्च
यतश्च लोका विहिता विधात्रा।
यत: पुमांस: प्रमदाश्च निर्मिता-
स्तदैव दोषा: प्रमदासु नारद॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
हे नारद! जहाँ से पाँच महाभूत उत्पन्न हुए हैं, जहाँ से प्रजापति ने सम्पूर्ण लोकों की रचना की है और जहाँ से स्त्री-पुरुष उत्पन्न हुए हैं, वहीं से स्त्रियों में ये दोष भी उत्पन्न हुए हैं (अर्थात् ये स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं)।॥30॥
 
O Narada! From where the five great elements have originated, from where the Creator has created all the worlds and from where men and women have been created, from there these defects in women have also been created (i.e. these are the natural defects of women).॥ 30॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पञ्चचूडानारदसंवादे अष्टत्रिंशोऽध्याय: ॥ ३८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पंचचूड़ा और नारदका संवादविषयक अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)