श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 4: आजमीढके वंशका वर्णन तथा विश्वामित्रके जन्मकी कथा और उनके पुत्रोंके नाम  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.4.33 
स्वमपत्यं विशिष्टं हि सर्व इच्छत्यनाविलम्।
व्यक्तं भगवता चात्र कृतमेवं भविष्यति॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
प्रायः सभी लोग अपने लिए सर्वगुणसम्पन्न पवित्र एवं उत्तम पुत्र की कामना करते हैं। निश्चय ही भगवान ऋचीक ने हवि बनाते समय इसी क्रम को ध्यान में रखा होगा॥ 33॥
 
‘Almost all people desire for themselves a pure and excellent son having all the virtues. Surely Lord Richika must have kept such a sequence in mind while preparing the offering.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)