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स तुतोष च ब्रह्मर्षिस्तस्या वृत्तेन भारत।
छन्दयामास चैवैनां वरेण वरवर्णिनीम्॥ २१॥
अनुवाद
भरतनन्दन! ऋषि अपनी पत्नी के उत्तम आचरण से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने अपनी परम सुन्दरी पत्नी को मनचाहा वर देने की इच्छा प्रकट की ॥ 21॥
Bharatanandan! The sage was very pleased with the good behaviour of his wife. He expressed his desire to grant the desired boon to his extremely beautiful wife. ॥ 21॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥