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mahabharat 13.4.18: हे प्रिये! तब तपस्वियों में श्रेष्ठ ऋचीक ऋषि ने प्रसन्न होकर राजा गाधि को वे हजार सुन्दर घोड़े दे दिये।   |   mahabharat अध्याय 13.4: आजमीढके वंशका वर्णन तथा विश्वामित्रके जन्मकी कथा और उनके पुत्रोंके नाम   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 4: आजमीढके वंशका वर्णन तथा विश्वामित्रके जन्मकी कथा और उनके पुत्रोंके नाम  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  13.4.18 
ततो वै गाधये तात सहस्रं वाजिनां शुभम्।
ऋचीक: प्रददौ प्रीत: शुल्कार्थं तपतां वर:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे प्रिये! तब तपस्वियों में श्रेष्ठ ऋचीक ऋषि ने प्रसन्न होकर राजा गाधि को वे हजार सुन्दर घोड़े दे दिये।
 
O dear! Then Rishi Richik, the best amongst ascetic sages, being pleased, gave those thousand beautiful horses to King Gadhi as payment.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)