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श्लोक 13.39.17-18  |
ऋणमुन्मुच्य देवानामृषीणां च तथैव च।
पितॄॄणामथ विप्राणामतिथीनां च पञ्चमम्॥ १७॥
पर्यायेण विशुद्धेन सुविनीतेन कर्मणा।
एवं गृहस्थ: कर्माणि कुर्वन् धर्मान्न हीयते॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| जो गृहस्थ यज्ञ करके देवताओं के ऋण से, वेदों के स्वाध्याय से ऋषियों के ऋण से, श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न करके श्राद्ध करके पितृ ऋण से, दान देकर ब्राह्मणों के ऋण से तथा सत्कार करके अतिथियों के ऋण से मुक्त हो जाता है तथा क्रमशः शुद्ध एवं विनम्र प्रयास से शास्त्रविहित अनुष्ठान करता है, वह गृहस्थ कभी धर्म से भ्रष्ट नहीं होता ॥17-18॥ |
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| The householder who frees himself from debt to the gods by performing Yagya, from debt to the sages by self-study of the Vedas, from debt to the ancestors by giving birth to a great son and performing Shraddha, from debt to the Brahmins by giving donations and from the debt to the guests by offering hospitality and respectively performs the rituals prescribed in the scriptures with pure and humble effort, that householder never gets corrupted by religion. 17-18॥ |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि पात्रपरीक्षायां सप्तत्रिंशोऽध्याय:॥ ३७॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें पात्रकी परीक्षाविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३७॥
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