श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 38: ब्राह्मणकी प्रशंसाके विषयमें इन्द्र और शम्बरासुरका संवाद  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  13.38.16 
भूमिरेतौ निगिरति सर्पो बिलशयानिव।
राजानं चाप्ययोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
जैसे साँप अपने बिलों में रहने वाले छोटे-छोटे जीवों को निगल जाता है, वैसे ही यह पृथ्वी युद्ध न करने वाले क्षत्रिय को और शिक्षा की खोज में भ्रमण न करने वाले ब्राह्मण को निगल जाती है॥ 16॥
 
Just as a snake swallows the small creatures living in its burrows, similarly this earth swallows up a Kshatriya who does not fight a war and a Brahmin who does not travel in search of education.॥ 16॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)