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mahabharat 13.35.9: मैं उनका अंत नहीं देख सकता। उनके लिए कोई दरवाज़ा बंद नहीं है। जब वे क्रोधित होते हैं, तो जंगल की आग की लपटों की तरह हो जाते हैं और दूसरों को भी उसी जलती हुई नज़र से देखने लगते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.35: ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 35: ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  13.35.9 
नान्तमेषां प्रपश्यामि न दिशश्चाप्यपावृता:।
कुपिता: समुदीक्षन्ते दावेष्वग्निशिखा इव॥ ९॥
 
 
अनुवाद
मैं उनका अंत नहीं देख सकता। उनके लिए कोई दरवाज़ा बंद नहीं है। जब वे क्रोधित होते हैं, तो जंगल की आग की लपटों की तरह हो जाते हैं और दूसरों को भी उसी जलती हुई नज़र से देखने लगते हैं।
 
I cannot see their end. No door is closed for them. When they become angry, they become like the flames of a forest fire and start looking at others with the same burning gaze.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)