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mahabharat 13.35.7: राजा के लिए ब्राह्मण अपने पिता के समान ही पूजनीय, आदर एवं सम्मान का पात्र है। जिस प्रकार प्राणियों का जीवन वर्षा करने वाले इंद्र पर निर्भर है, उसी प्रकार संसार की जीवन यात्रा भी ब्राह्मणों पर निर्भर है।   |   mahabharat अध्याय 13.35: ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 35: ब्राह्मणके महत्त्वका वर्णन  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  13.35.7 
ते पूज्यास्ते नमस्कार्या मान्यास्ते पितरो यथा।
तेष्वेव यात्रा लोकानां भूतानामिव वासवे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
राजा के लिए ब्राह्मण अपने पिता के समान ही पूजनीय, आदर एवं सम्मान का पात्र है। जिस प्रकार प्राणियों का जीवन वर्षा करने वाले इंद्र पर निर्भर है, उसी प्रकार संसार की जीवन यात्रा भी ब्राह्मणों पर निर्भर है।
 
For a king, a Brahmin is as worthy of worship, respect and honour as his father. Just as the life of living beings depends on Indra who brings rain, similarly the life journey of the world is dependent on Brahmins. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)