श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 33: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक  13.33.36 
तस्मात् त्वमपि कौन्तेय पितृदेवद्विजातिथीन्।
सम्यक् पूजयसे नित्यं गतिमिष्टामवाप्स्यसि॥ ३६॥
 
 
अनुवाद
अतः हे कुन्तीपुत्र! यदि तुम भी देवताओं, पितरों, ब्राह्मणों और अतिथियों का सदैव विधिपूर्वक पूजन और सत्कार करोगे, तो तुम्हें अभीष्ट गति की प्राप्ति होगी।
 
Therefore, O son of Kunti! If you too always worship and honour the gods, ancestors, Brahmins and guests properly, then you will achieve the desired destination. 36.
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि कृष्णनारदसंवादे एकत्रिंशोऽध्याय: ॥ ३१॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्रीकृष्ण-नारदसंवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ ३१॥

 
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd