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mahabharat 13.33.25: श्री कृष्ण! मैं उन ऋषियों को सदैव नमस्कार करता हूँ जो लोकों के रचयिता हैं, जो संसार में श्रेष्ठ हैं, जो श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुए हैं, जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करते हैं और जो सूर्य के समान जगत को ज्ञानरूपी ज्योति प्रदान करते हैं॥25॥   |   mahabharat अध्याय 13.33: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.33.25 
नित्यमेतान् नमस्यामि कृष्ण लोककरानृषीन्।
लोकज्येष्ठान्कुलज्येष्ठांस्तमोघ्नाँल्लोकभास्करान्॥ २५॥
 
 
अनुवाद
श्री कृष्ण! मैं उन ऋषियों को सदैव नमस्कार करता हूँ जो लोकों के रचयिता हैं, जो संसार में श्रेष्ठ हैं, जो श्रेष्ठ कुल में उत्पन्न हुए हैं, जो अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करते हैं और जो सूर्य के समान जगत को ज्ञानरूपी ज्योति प्रदान करते हैं॥25॥
 
Sri Krishna! I always bow my head to those sages who are the creators of the worlds, who are the best in the world, who are born in the best family, who destroy the darkness of ignorance and who provide the world of knowledge to the world like the sun. 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)