श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 33: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  13.33.20 
देवतातिथिपूजायां युक्ता ये गृहमेधिन:।
कपोतवृत्तयो नित्यं तान् नमस्यामि यादव॥ २०॥
 
 
अनुवाद
यादव! मैं उन गृहस्थ ब्राह्मणों को प्रणाम करता हूँ जो सदैव कबूतरों की तरह रहते हैं और देवताओं तथा अतिथियों की पूजा में लगे रहते हैं।
 
Yadav! I bow my head to those householder Brahmins who always live like doves and remain engaged in the worship of gods and guests.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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