| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 33: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन » श्लोक 18-19 |
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| | | | श्लोक 13.33.18-19  | निर्ममा निष्प्रतिद्वन्द्वा निर्ह्रीका निष्प्रयोजना:।
ये वेदं प्राप्य दुर्धर्षा वाग्मिनो ब्रह्मवादिन:॥ १८॥
अहिंसानिरता ये च ये च सत्यव्रता नरा:।
दान्ता: शमपराश्चैव तान् नमस्यामि केशव॥ १९॥ | | | | | | अनुवाद | | केशव! जिनके हृदय में आसक्ति नहीं है, जो द्वेष से रहित हैं, जो लज्जा से परे हैं और जिनमें कहीं भी कोई स्वार्थ नहीं है, जो वेदों के ज्ञान का बल पाकर प्रखर हो गए हैं, जो प्रवचन में कुशल हैं और ब्रह्मवादी हैं, जिन्होंने अहिंसा परायण होकर सदैव सत्य बोलने का व्रत लिया है तथा जो आत्मसंयम और मन-संयम के साधनों में लगे हुए हैं, उन सबको मैं नमस्कार करता हूँ। | | | | Keshav! I salute those who do not have any attachment in their hearts, who are devoid of rivalries, who are above shame and who do not have any selfish motives anywhere, who have become fierce by gaining the power of the knowledge of the Vedas, who are skilled in discourse and are Brahmavaadis, who have taken a vow to always speak the truth while being devoted to non-violence and who are engaged in the means of self-control and mind-control. | | ✨ ai-generated | | |
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