श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 33: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  13.33.17 
भैक्ष्यचर्यासु निरता: कृशा गुरुकुलाश्रया:।
नि:सुखा निर्धना ये तु तान् नमस्यामि यादव॥ १७॥
 
 
अनुवाद
हे यदुवंशी भूषण! मैं उन गुरुकुलवासियों को नमस्कार करता हूँ जो भिक्षाटन करके अपना जीवनयापन करते हैं, जिनके शरीर तपस्या के कारण दुर्बल हो गए हैं और जो धन और सुख की कभी चिंता नहीं करते।॥ 17॥
 
O Bhusan of the Yadu clan! I salute those who live in the Gurukul and earn their living through alms, whose bodies have become weak due to austerities and who never worry about wealth and pleasure.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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