श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 33: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.33.15 
गुरुप्रसादे स्वाध्याये यतन्तो ये स्थिरव्रता:।
शुश्रूषवोऽनसूयन्तस्तान् नमस्यामि यादव॥ १५॥
 
 
अनुवाद
यदुकुलतिलक! जो गुरु को प्रसन्न रखने का सदैव प्रयत्न करते हैं और स्वयं ही जीवन का अध्ययन करते हैं, जिनके व्रत कभी खंडित नहीं होते, जो गुरुजनों की सेवा करते हैं और कभी किसी में दोष नहीं देखते, उनको मैं नमस्कार करता हूँ॥ 15॥
 
Yadukultilak! I salute those who always strive to keep their Guru happy and study their own life, whose vows are never broken, who serve their teachers and never find faults in anyone.॥ 15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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