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श्लोक 13.33.12  |
ये भृत्यभरणे शक्ता: सततं चातिथिव्रता:।
भुञ्जते देवशेषाणि तान् नमस्यामि यादव॥ १२॥ |
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| अनुवाद |
| जो अपने माता-पिता, परिवार के सदस्यों और सेवकों का भरण-पोषण करने में समर्थ हैं, जिन्होंने सदैव अतिथियों की सेवा करने का व्रत लिया है और जो केवल दिव्य यज्ञों से बचा हुआ अन्न ही खाते हैं, उनको मैं नमस्कार करता हूँ। ॥12॥ |
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| I bow before those who are capable of supporting their parents, family members and servants, who have taken a vow to always serve guests and who eat only the food left over from divine sacrifices. ॥12॥ |
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