श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 33: नारदजीके द्वारा पूजनीय पुरुषोंके लक्षण तथा उनके आदर-सत्कार और पूजनसे प्राप्त होनेवाले लाभका वर्णन  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  13.33.10 
सम्यग् यजन्ति ये चेष्टी: क्षान्ता दान्ता जितेन्द्रिया:।
सत्यं धर्मं क्षितिं गाश्च तान् नमस्यामि यादव॥ १०॥
 
 
अनुवाद
यदुनंदन! मैं उन लोगों को नमस्कार करता हूँ जो विधिपूर्वक यज्ञ करते हैं, जो क्षमाशील हैं, जिन्होंने अपनी इन्द्रियों और मन को वश में कर लिया है तथा जो सत्य, धर्म, पृथ्वी और गौओं की पूजा करते हैं।॥ 10॥
 
Yadu Nandan! I salute those who perform the Yagyas as per the prescribed rituals, those who are forgiving, those who have controlled their senses and mind and those who worship truth, religion, earth and cows.॥ 10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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