श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 64
 
 
श्लोक  13.32.64 
तस्यात्मजश्च प्रमितिर्वेदवेदाङ्गपारग:।
घृताच्यां तस्य पुत्रस्तु रुरुर्नामोदपद्यत॥ ६४॥
 
 
अनुवाद
वागिन्द्र के पुत्र प्रमिति थे जो वेद और वेदांगों के पारंगत विद्वान थे। प्रमिति के घृताची अप्सरा से रुरुण नामक पुत्र उत्पन्न हुआ ॥64॥
 
Vagindra's son was Pramiti who was an expert scholar of Vedas and Vedangas. Pramiti had a son named Rurun from Ghritachi Apsara. 64॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd