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श्लोक 13.32.59-60  |
ऋग्वेदे वर्तते चाग्रॺा श्रुतिर्यस्य महात्मन:॥ ५९॥
यत्र गृत्समदो राजन् ब्राह्मणै: स महीयते।
स ब्रह्मचारी विप्रर्षि: श्रीमान् गृत्समदोऽभवत्॥ ६०॥ |
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| अनुवाद |
| ऋग्वेद में महर्षि गृत्समद की महान श्रुति विद्यमान है। हे राजन! वहाँ के ब्राह्मण गृत्समद का बहुत आदर करते हैं। ब्रह्मर्षि गृत्समद अत्यंत तेजस्वी और ब्रह्मचारी थे। 59-60। |
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| The great Shruti of the great sage Gritsamad is present in the Rigveda. O King! The Brahmins there respect Gritsamad a lot. Brahmarshi Gritsamad was very brilliant and a celibate. 59-60. |
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