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mahabharat 13.32.55: क्योंकि मैंने अपने पराक्रम से इस राजा को अपनी जाति त्यागने पर विवश कर दिया था। हे ब्रह्मन्! मुझे जाने दो और अपने कल्याण के विषय में विचार करने दो॥ 55॥   |   mahabharat अध्याय 13.32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  13.32.55 
य एष राजा वीर्येण स्वजातिं त्याजितो मया।
अनुजानीहि मां ब्रह्मन् ध्यायस्व च शिवेन माम्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
क्योंकि मैंने अपने पराक्रम से इस राजा को अपनी जाति त्यागने पर विवश कर दिया था। हे ब्रह्मन्! मुझे जाने दो और अपने कल्याण के विषय में विचार करने दो॥ 55॥
 
Because by my valour I forced this king to abandon his caste. O Brahman! Please allow me to go and think about my welfare. ॥ 55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)