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श्लोक 13.32.53-54  |
एतत् तु वचनं श्रुत्वा भृगोस्तथ्यं प्रतर्दन:॥ ५३॥
पादावुपस्पृश्य शनै: प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत्।
एवमप्यस्मि भगवन् कृतकृत्यो न संशय:॥ ५४॥ |
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| अनुवाद |
| महर्षि भृगु के ये सत्य वचन सुनकर प्रतर्दन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और धीरे से उनके चरण स्पर्श करके बोला - 'प्रभो! यदि ऐसी बात है तो मैं संतुष्ट हूँ, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। |
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| On hearing these true words of Maharishi Bhrigu, Pratrdan became very happy and gently touched his feet and said - 'Lord! If this is the case then I am satisfied, there is no doubt about it. |
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