श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 53-54
 
 
श्लोक  13.32.53-54 
एतत् तु वचनं श्रुत्वा भृगोस्तथ्यं प्रतर्दन:॥ ५३॥
पादावुपस्पृश्य शनै: प्रहृष्टो वाक्यमब्रवीत्।
एवमप्यस्मि भगवन् कृतकृत्यो न संशय:॥ ५४॥
 
 
अनुवाद
महर्षि भृगु के ये सत्य वचन सुनकर प्रतर्दन अत्यन्त प्रसन्न हुआ और धीरे से उनके चरण स्पर्श करके बोला - 'प्रभो! यदि ऐसी बात है तो मैं संतुष्ट हूँ, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।
 
On hearing these true words of Maharishi Bhrigu, Pratrdan became very happy and gently touched his feet and said - 'Lord! If this is the case then I am satisfied, there is no doubt about it.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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