श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 51-52h
 
 
श्लोक  13.32.51-52h 
उत्सादितश्च विषय: काशीनां रत्नसंचय:।
एतस्य वीर्यदृप्तस्य हतं पुत्रशतं मया॥ ५१॥
अस्येदानीं वधादद्य भविष्याम्यनृण: पितु:।
 
 
अनुवाद
इतना ही नहीं, उसके पुत्रों ने काशीप्रमाण के सम्पूर्ण राज्य को उजाड़ दिया है और रत्नों का संग्रह लूट लिया है। मैंने अपने बल के अभिमान में चूर इस राजा के सौ पुत्रों को मार डाला है; अब केवल ये ही शेष बचे हैं। अब इनका वध करके मैं अपने पितृऋण से उऋण हो जाऊँगा।
 
Not only this, his sons have devastated the entire kingdom of Kashipramana and looted the collection of gems. I have killed a hundred sons of this king who was full of pride of his power; now only these are left. By killing them now, I will repay the debt of my father. 51 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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