श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  13.32.47 
भो भो: केऽत्राश्रमे सन्ति भृगो: शिष्या महात्मन:।
द्रष्टुमिच्छे मुनिमहं तस्याचक्षत मामिति॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
भाइयो! इस आश्रम में महात्मा भृगु के कौन-कौन शिष्य हैं? मैं महर्षिक से मिलना चाहता हूँ। आप सब उन्हें मेरे आगमन की सूचना दीजिए।॥ 47॥
 
Brothers! Who are the disciples of Mahatma Bhrigu in this ashram? I want to meet Maharshika. You all please inform them about my arrival.॥ 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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