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mahabharat 13.32.45: राजन! वहां नरेश्वर वीतहव्य ने महर्षि भृगुकि की शरण ली। तब भृगुण ने राजा को संरक्षण दिया। 45॥   |   mahabharat अध्याय 13.32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  13.32.45 
ययौ भृगुं च शरणं वीतहव्यो नराधिप:।
अभयं च ददौ तस्मै राज्ञे राजन् भृगुस्तदा॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
राजन! वहां नरेश्वर वीतहव्य ने महर्षि भृगुकि की शरण ली। तब भृगुण ने राजा को संरक्षण दिया। 45॥
 
Rajan! There Nareshwar Veethavya took refuge in Maharishi Bhriguki. Then Bhrigun gave protection to the king. 45॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)