श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  13.32.33 
तत: स कवची धन्वी स्तूयमान: सुरर्षिभि:।
वन्दिभिर्वन्द्यमानश्च बभौ सूर्य इवोदित:॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
तत्पश्चात् राजकुमार प्रतर्दन ने कवच धारण किया और हाथ में धनुष लिया। उस समय देवताओं के ऋषिगण उसकी स्तुति करने लगे। बन्दियों द्वारा पूजित होकर वह उदित सूर्य के समान चमकने लगा।
 
Thereafter Prince Pratardana wore armour on his body and took a bow in his hand. At that time the sages of the gods started singing his praises. Being worshipped by the prisoners he started shining like the rising sun.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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