श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  13.32.30 
तत इष्टिं चकारर्षिस्तस्य वै पुत्रकामिकीम्।
अथास्य तनयो जज्ञे प्रतर्दन इति श्रुत:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
तब ऋषि ने राजा से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया, जिससे उसे प्रतर्दन नामक एक प्रसिद्ध पुत्र हुआ ॥30॥
 
Then the sage made the king perform Putreshti Yagya. From this he had a famous son named Pratardan. 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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