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श्लोक 13.32.29  |
अहमिष्टिं करिष्यामि पुत्रार्थं ते विशाम्पते।
वीतहव्यसहस्राणि येन त्वं प्रहरिष्यसि॥ २९॥ |
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| अनुवाद |
| प्रजानाथ! मैं तुम्हारे लिए पुत्र प्राप्ति हेतु यज्ञ करूँगा, जिसके प्रभाव से तुम वीतहव्य के हजारों पुत्रों का वध करोगे।' |
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| Prajanaath! I will perform a yajna for you to get a son, with the help of which you will kill thousands of sons of Vithahavya.' |
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