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mahabharat 13.32.26: राजा ने कहा, "हे प्रभु! युद्ध में वीतहव्य के पुत्रों ने मेरे कुल का नाश कर दिया। मैं अकेला ही अत्यंत दुःखी होकर आपकी शरण में आया हूँ।"   |   mahabharat अध्याय 13.32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  13.32.26 
राजोवाच
भगवन् वैतहव्यैर्मे युद्धे वंश: प्रणाशित:।
अहमेक: परिद्यूनो भवन्तं शरणं गत:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
राजा ने कहा, "हे प्रभु! युद्ध में वीतहव्य के पुत्रों ने मेरे कुल का नाश कर दिया। मैं अकेला ही अत्यंत दुःखी होकर आपकी शरण में आया हूँ।"
 
The king said, "O Lord! In the war the sons of Vitahavya destroyed my clan. I alone am extremely distressed and have come to your refuge."
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)