श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 24-25
 
 
श्लोक  13.32.24-25 
तमुवाच भरद्वाजो ज्येष्ठ: पुत्रो बृहस्पते:।
पुरोधा: शीलसम्पन्नो दिवोदासं महीपतिम्॥ २४॥
किमागमनकृत्यं ते सर्वं प्रब्रूहि मे नृप।
यत् ते प्रियं तत् करिष्ये न मेऽत्रास्ति विचारणा॥ २५॥
 
 
अनुवाद
बृहस्पति के ज्येष्ठ पुत्र भरद्वाजजी बड़े ही पुण्यात्मा थे और दिवोदास के पुरोहित थे। राजा को उपस्थित देखकर उन्होंने पूछा - 'नरेश्वर! आपको यहाँ आने की क्या आवश्यकता थी? मुझे अपना सब समाचार सुनाइए। जो भी आपका प्रिय कार्य होगा, मैं उसे करूँगा। इसके लिए मैं अन्य किसी बात का विचार नहीं करूँगा।'॥ 24-25॥
 
Brihaspati's eldest son Bharadwajji was a very virtuous person and was the priest of Divodas. Seeing the king present, he asked - 'Nareshwar! What was the need for you to come here? Tell me all your news. Whatever is your favourite work, I will do it. I will not have any other thought for this.'॥ 24-25॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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