श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  13.32.23 
गत्वाऽऽश्रमपदं रम्यं भरद्वाजस्य धीमत:।
जगाम शरणं राजा कृताञ्जलिररिंदम॥ २३॥
 
 
अनुवाद
शत्रुराज! राजा दिवोदास बुद्धिमान भारद्वाज के रमणीय आश्रम में गए और हाथ जोड़कर वहाँ शरण ली॥23॥
 
Enemy King! King Divodas went to the delightful ashram of wise Bharadwaja and took refuge there with folded hands. 23॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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