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mahabharat 13.32.18: हे महाराज! उस नगर की सीमा का एक छोर गंगा के उत्तरी तट तक और दूसरा छोर गोमती नदी के दक्षिणी तट तक फैला हुआ था। वह नगरी इंद्र की अमरावतीपुरी के समान प्रतीत होती थी।   |   mahabharat अध्याय 13.32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 32: वीतहव्यके पुत्रोंसे काशी-नरेशोंका घोर युद्ध, प्रतर्दनद्वारा उनका वध और राजा वीतहव्यको भृगुके कथनसे ब्राह्मणत्व प्राप्त होनेकी कथा  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  13.32.18 
गङ्गाया उत्तरे कूले वप्रान्ते राजसत्तम।
गोमत्या दक्षिणे कूले शक्रस्येवामरावतीम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
हे महाराज! उस नगर की सीमा का एक छोर गंगा के उत्तरी तट तक और दूसरा छोर गोमती नदी के दक्षिणी तट तक फैला हुआ था। वह नगरी इंद्र की अमरावतीपुरी के समान प्रतीत होती थी।
 
O great king! One end of the boundary of that city extended till the northern bank of the Ganges and the other end till the southern bank of the Gomati river. That city looked like Indra's Amaravatipuri.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)