श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 31: मतङ्गकी तपस्या और इन्द्रका उसे वरदान देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.31.3 
मतङ्ग उवाच
इदं वर्षसहस्रं वै ब्रह्मचारी समाहित:।
अतिष्ठमेकपादेन ब्राह्मण्यं नाप्नुयां कथम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मतंग बोले - देवराज ! मैंने एक हजार वर्षों तक ब्रह्मचर्यपूर्वक एक पैर पर खड़े होकर तप किया है। फिर मैं ब्राह्मणत्व कैसे प्राप्त न करूँ ?॥3॥
 
Matang said - Devraj! I have meditated by standing on one leg for a thousand years with a celibate mind. Then how can I not attain brahminhood?॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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