श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 31: मतङ्गकी तपस्या और इन्द्रका उसे वरदान देना  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  13.31.26 
एवमेतत् परं स्थानं ब्राह्मण्यं नाम भारत।
तच्च दुष्प्रापमिह वै महेन्द्रवचनं यथा॥ २६॥
 
 
अनुवाद
भारत! इस प्रकार यह ब्राह्मणत्व परम उत्तम पद है। जैसा इन्द्र ने कहा है, इस जीवन में अन्य वर्णों के लोगों के लिए यह दुर्लभ है॥ 26॥
 
Bharat! Thus this brahminhood is the most excellent position. As Indra has said, it is rare for people of other castes in this life.॥ 26॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे एकोनत्रिंशोऽध्याय:॥ २९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और मतङ्गका संवादविषयक उनतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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