| श्री महाभारत » पर्व 13: अनुशासन पर्व » अध्याय 31: मतङ्गकी तपस्या और इन्द्रका उसे वरदान देना » श्लोक 21-22h |
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| | | | श्लोक 13.31.21-22h  | वैशम्पायन उवाच
वृणीष्वेति तदा प्राह ततस्तं बलवृत्रहा॥ २१॥
चोदितस्तु महेन्द्रेण मतङ्ग: प्राब्रवीदिदम्। | | | | | | अनुवाद | | वैशम्पायनजी कहते हैं: हे जनमेजय! तब बल और वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र ने मतंग से कहा, ‘मुझसे वर मांगो।’ महेन्द्र की प्रेरणा से मतंग ने इस प्रकार कहा:-॥21 1/2॥ | | | | Vaishmpayana says: O Janamejaya! Then Indra, the slayer of Bala and Vritraasura, said to Matang, 'Ask a boon from me.' Inspired by Mahendra, Matang said thus:-॥ 21 1/2॥ | | ✨ ai-generated | | |
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