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mahabharat 13.30.16: ‘मतंग! ऐसा सोचकर ही मैंने तुमसे कोई अन्य इच्छित वस्तु माँगने को कहा था; क्योंकि ब्राह्मण होना अत्यंत दुर्लभ है।’॥16॥   |   mahabharat अध्याय 13.30: ब्राह्मणत्व प्राप्त करनेका आग्रह छोड़कर दूसरा वर माँगनेके लिये इन्द्रका मतङ्गको समझाना   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.30.16 
मतङ्ग सम्प्रधार्यैवं यदहं त्वामचूचुदम्।
वृणीष्व काममन्यं त्वं ब्राह्मण्यं हि सुदुर्लभम्॥ १६॥
 
 
अनुवाद
‘मतंग! ऐसा सोचकर ही मैंने तुमसे कोई अन्य इच्छित वस्तु माँगने को कहा था; क्योंकि ब्राह्मण होना अत्यंत दुर्लभ है।’॥16॥
 
‘Matang! Thinking this only I told you to ask for some other desired thing; because being a brahmin is extremely rare.’॥ 16॥
 
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि इन्द्रमतङ्गसंवादे अष्टाविंशोऽध्याय:॥ २८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें इन्द्र और मतङ्गका संवादविषयक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २८॥

 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)